शबे मेराज का इस्लाम मजहब में बहुत बड़ा
मुकाम है। इस रात की बड़ी फजीलत है। इस रात में अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रिसालत अता फरमाई
शबे मेराज की बड़ी फजीलत है। इस रात में अल्लाह तआला ने अपने नबी करीम को दीदार और मुलाकात करने के लिए अर्शे आज़म पर बुलाया। इस वाकये का जिक्र कुरान शरीफ में 15वां पारा बनी इसराइल की पहली आयत में है। अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया―, ‘पाकी है उसे, जो अपने बंदे खास को रातों रात ले गया मस्जिदे हराम मक्का मुकर्रमा सउदी अरब से मस्जिदे अक़्सा फिलिस्तीन तक, जिसके इर्द-गिर्द हमने बरकत रखी। कि हम उसे अपनी अज़ीम निशानियां दिखाईं। बेशक वह सुनता, देखता है।’ इसमें हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अज़ीम मोजज़ा(चमत्कार) और अल्लाह तआला की अज़ीम नेमत का जिक्र फरमाया गया है। इससे हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का वह कमाल-ए-क़ुर्ब (निकटता) ज़ाहिर होता है, जो मख़लूक़ात-ए-इलाही में आपके सिवा किसी को मयस्सर नहीं।
नबूवत के 12वीं साल 27वीं रजब को अल्लाह तआला अपने महबूब को आलमे बाला व ला मकां की सैर करवाई। यह बात याद रखने की है कि मक्का से बैतुल मुकद्दस तक रात के थोड़े से हिस्से में तशरीफ ले जाना कुरान शरीफ से साबित है। इसका इनकार करने वाला काफिर हो जाता है और आसमानों की सैर वहां के अजीबोगरीब नजारों का मुआयना करने और मनाज़िले क़ुर्ब में पहुंचना कई हदीस से साबित है। इसका मुनकिर गुमराह है।
मेराज शरीफ ब हालते बेदारी जिस्म और रूह दोनों के साथ अर्थात सशरीर हुई है। असहाबे कराम और आलिमे इस्लाम का यही अकीदा है।
रोजे जरूर रखें : इरशादे नबी है कि जिसने 27वीं रजब का रोज़ा रखा, उसको साठ महीनों के रोजों का सवाब मिलेगा। हज़रत सलमान फारसी रज़िअल्लाहो अनहो ने नकल फरमाया है कि माहे रजब में एक दिन और एक रात ऐसी है कि अगर इस दिन का कोई रोज़ा रखे और उस रात को इबादत करे, तो उसको 100 बरस रोज़े रखने वाले और 100 साल की रातों में इबादत करने वाले के बराबर सवाब मिलेगा। यह रात वह है जिसके बाद रजब की 3 रातें रह जाती हैं और यह वह दिन है जिस दिन अल्लाह तआला ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रिसालत अता फरमाई। माहे रजब के रोजों की बहुत बड़ी फजीलत है और 27 तारीख के रोज़ा का बहुत सवाब है। इस रोज़ा से अज़ाबे कब्र और नारे दोजख से महफूज़ रहेगा।
नमाज का तरीका : .शबे मेराज की रात बहुत अफजल है। इस रात में कई तरह की नमाजे नफिल पढ़ी जाती हैं। इस रात को 20 रकात नमाज 10 सलाम से पढ़ें। हर एक रात में सिर्फ आता के बाद सूरह इखलास एक दफा पढ़ें। इंशाअल्लाह तआला जो कोई यह नमाज पढ़ेंगे तो अल्लाह तआला उसकी जान और माल की हिफाजत फरमाएगा। आमीन!
राइटर : गुलाम गौस आसवी, शिक्षक धनबाद
मुकाम है। इस रात की बड़ी फजीलत है। इस रात में अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रिसालत अता फरमाई
शबे मेराज की बड़ी फजीलत है। इस रात में अल्लाह तआला ने अपने नबी करीम को दीदार और मुलाकात करने के लिए अर्शे आज़म पर बुलाया। इस वाकये का जिक्र कुरान शरीफ में 15वां पारा बनी इसराइल की पहली आयत में है। अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया―, ‘पाकी है उसे, जो अपने बंदे खास को रातों रात ले गया मस्जिदे हराम मक्का मुकर्रमा सउदी अरब से मस्जिदे अक़्सा फिलिस्तीन तक, जिसके इर्द-गिर्द हमने बरकत रखी। कि हम उसे अपनी अज़ीम निशानियां दिखाईं। बेशक वह सुनता, देखता है।’ इसमें हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अज़ीम मोजज़ा(चमत्कार) और अल्लाह तआला की अज़ीम नेमत का जिक्र फरमाया गया है। इससे हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का वह कमाल-ए-क़ुर्ब (निकटता) ज़ाहिर होता है, जो मख़लूक़ात-ए-इलाही में आपके सिवा किसी को मयस्सर नहीं।
नबूवत के 12वीं साल 27वीं रजब को अल्लाह तआला अपने महबूब को आलमे बाला व ला मकां की सैर करवाई। यह बात याद रखने की है कि मक्का से बैतुल मुकद्दस तक रात के थोड़े से हिस्से में तशरीफ ले जाना कुरान शरीफ से साबित है। इसका इनकार करने वाला काफिर हो जाता है और आसमानों की सैर वहां के अजीबोगरीब नजारों का मुआयना करने और मनाज़िले क़ुर्ब में पहुंचना कई हदीस से साबित है। इसका मुनकिर गुमराह है।
मेराज शरीफ ब हालते बेदारी जिस्म और रूह दोनों के साथ अर्थात सशरीर हुई है। असहाबे कराम और आलिमे इस्लाम का यही अकीदा है।
रोजे जरूर रखें : इरशादे नबी है कि जिसने 27वीं रजब का रोज़ा रखा, उसको साठ महीनों के रोजों का सवाब मिलेगा। हज़रत सलमान फारसी रज़िअल्लाहो अनहो ने नकल फरमाया है कि माहे रजब में एक दिन और एक रात ऐसी है कि अगर इस दिन का कोई रोज़ा रखे और उस रात को इबादत करे, तो उसको 100 बरस रोज़े रखने वाले और 100 साल की रातों में इबादत करने वाले के बराबर सवाब मिलेगा। यह रात वह है जिसके बाद रजब की 3 रातें रह जाती हैं और यह वह दिन है जिस दिन अल्लाह तआला ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को रिसालत अता फरमाई। माहे रजब के रोजों की बहुत बड़ी फजीलत है और 27 तारीख के रोज़ा का बहुत सवाब है। इस रोज़ा से अज़ाबे कब्र और नारे दोजख से महफूज़ रहेगा।
नमाज का तरीका : .शबे मेराज की रात बहुत अफजल है। इस रात में कई तरह की नमाजे नफिल पढ़ी जाती हैं। इस रात को 20 रकात नमाज 10 सलाम से पढ़ें। हर एक रात में सिर्फ आता के बाद सूरह इखलास एक दफा पढ़ें। इंशाअल्लाह तआला जो कोई यह नमाज पढ़ेंगे तो अल्लाह तआला उसकी जान और माल की हिफाजत फरमाएगा। आमीन!
राइटर : गुलाम गौस आसवी, शिक्षक धनबाद
